Batukeshwar Datt की अनसुनी कहानी

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Batukeshwar Datt की अनसुनी कहानी

क्रांतिकारी भगत सिंह के साथ मिलकर असेंबली में बम फेंकने वाले क्रांतिकारी Batukeshwar Datt की स्टोरी बताती है कि शहीद क्रांतिकारियों की पूजा करने वाला यह हिंदुस्तान, उनके जीवित रहते हुए उनके साथ क्या व्यवहार करता है।

भारत की स्वतंत्रता के लिए फांसी पर लटक जाने वाले क्रांतिकारियों की लम्बी सूची यद्यपि आप को भारत के इतिहास में मिल भी जाये। पर इस प्रकार के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जो जीवित तो रहे परंतु उन्होंने देश को आजादी दिलाने के लिए मृत्यु से भी भयंकर मुश्किलें झेली, इस प्रकार के बस चंद ही व्यक्तियों के नाम आप लोगों को शायद पता हो। देश की आज़ादी के उपरांत जैसे, इन सेनानियों का वजूद ही समाप्त हो गया। इन्हीं में से एक है बटुकेश्वर दत्त। वहीं बटुकेश्वर दत्त जिन्होंने सरदार भगत सिंह के साथ मिलकर असेंबली में बम फेंका था, तथा उनके साथ अरेस्ट हुए थे एवं जब भगत सिंह को अंग्रेज ऑफ़िसर सांडर्स के मर्डर के लिए फांसी की सजा सुनाई गई तब इन्हें भी काले पानी की सजा सुनाई गई थी।

पंजाब के एक प्रांत हुसैनीवाला में भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरू की समाधि के अतिरिक्त एक अन्य समाधि भी है। यह समाधि स्वतंत्रता संग्राम के उस वीर सिपाही की समाधि है जो सरदार भगत सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता के लिए युद्ध लड़ा था लेकिन, उसे स्वतंत्रता के बाद बिल्कुल भुला दिया गया। इस वीर सिपाही का नाम बटुकेश्वर दत्त था। सुखदेव, भगत सिंह एवं राजगुरू को व्यक्ति फिर भी शहीद दिवस अथवा उनके जन्म दिन के अवसर पर याद कर लेते हैं क्योंकि उन्होंने तो शहीद होकर लोगों के दिलों में इस प्रकार की जगह प्राप्त कर ली है। जो सदियों तक बनी रहेगी। परंतु बटुकेश्वर दत्त, जिन्होंने जिंदगी भर के कारावास में कारागार की प्रताड़नाएं सही, एवं फिर कारागार से बाहर आने के उपरांत पुन: हिंदुस्तानी स्वतंत्रता संग्राम में कॉन्ट्रिब्यूशन दिया, उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद की जिंदगी भी गुमनामी में ही गुज़ारी।

 

 

बटुकेश्वर दत्त – Batukeshwar Datt

क्रांतिकारी Batukeshwar का जन्म 18 नवम्बर वर्ष 1910 को बंगाल के एक कायस्थ परिवार में ग्राम-औरी, डिस्ट्रिक्ट नानी बर्दवान (बंगाल) में हुआ था। मगर पढ़ाई लिखाई की बात करेंं तो उन्‍होंने स्नातक की पढ़ाई कानपुर से पूरी की। इनकी स्नातक की पढ़ाई पी॰पी॰एन॰ कॉलेज, कानपुर में संपन्न हुई। सन 1924 में कानपुर में ही इनकी भगत सिंह से मुलाकात हुई। भगत सिंह के संपर्क में आकर बटुकेश्वर उनके क्रांतिकारी संगठन “Hindustan Socialist Republican Association” से जुड़ गए। और उन्होंने बम बनाना भी सीख लिया। इन सभी के द्वारा उस समय आगरा में एक बम बनाने की फैक्ट्री भी बनाई गई थी जिसमें बटुकेश्वर ने बहुत महत्वपूर्ण रोल अदा किया था।

आठ अप्रैल वर्ष 1929 को तत्कालीन संसद में पब्लिक सेफ्टी बिल एवं ट्रेड डिस्प्यूट बिल पारित किया गया था। जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर नियंत्रण के लिए पुलिस वालों को अधिक अधिकार देना। इसको लेकर विरोध जताने हेतु भगतसिंह एवं बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेंबली के अंदर बम फेंक कर विस्फोट किया। बम इस प्रकार से बनाया गया था, कि किसी व्यक्ति की जान न जाए। बम के साथ ही लाल रंग के पर्चों की प्रतियाँ भी फेंकी गई थी, जिनमें क्रान्तिकारियों द्वारा बम फेंकने का मकसद बताया गया था। इस विरोध की वजह से यह बिल सिर्फ एक मत से पारित नहीं हो पाया था।

 

 

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की प्रेरणादायक कहानी – Bhagat Singh and Batukeshwar Datt

सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के उपरांत Batukeshwar Datt और भगतसिंह ने भागकर बचने का कोई प्रयास नहीं किया, क्योंकि वे कोर्ट में वक्तव्य देकर सबको अपने मनोभावों से परिचित करवाना चाहते थे। इसके साथ ही इस भ्रम को भी खत्म करना चाहते थे कि विस्फोट किसने किया है। जिससे कि पुलिस अन्य व्यक्तियों को परेशान न करें। परिणामस्वरूप इन दोनों को अरेस्ट कर लिया गया। 12 जून वर्ष 1929 को इन दोनों को जिंदगी भर के कारावास की सजा सुनाई गई। सजा सुनाए जाने के पश्चात इनको लाहौर फोर्ट जेल में बंद कर दिया गया। यहां पर भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त पर लाहौर षडयंत्र का केस भी चलाया गया। आपको बता दें कि लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय को अंग्रेज सैनिकों द्वारा पीटे जाने की वजह से उनकी मौत हो गई थी। इस मौत का बदला क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ पुलिस ऑफिसर सांडर्स को मारकर लिया था। परंतु इस कार्यवाही के लिए इन क्रांतिकारियों पर लाहौर षड़यंत्र का केस चलाया गया, जिसमें राजगुरु, भगत सिंह एवं सुखदेव को फांसी की सजा मिली। जबकि बटुकेश्वर दत्त को जिंदगी भर जेल में रहने के लिए काला पानी की जेल में भेज दिया गया।

दोस्तों आप लोगों को बता दे फांसी की सजा न प्राप्त होने पर देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत बटुकेश्वर दुखी एवं अपमानित अनुभूत कर रहे थे। उन्होंने अपनी ये बात सरदार भगत सिंह तक भी पहुंचाई कि वे भी वतन पर शहीद होना चाहते है ये अधिक फख्र की बात है, तब भगत ने उनको ये लेटर लिखा कि वो दुनिया को ये दिखाएं कि क्रांतिकारी स्वयं के आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते अपितु जीवित रहकर भी जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर एक प्रकार का अत्याचार भी झेल सकते हैं। साथ ही उन्हें समझाया कि मौत सिर्फ सांसारिक तकलीफों से आज़ादी की वजह नहीं बननी चाहिए।

बटुकेश्वर दत्त ने यही किया। काले पानी की सजा के अंतर्गत उन्हें अंडमान की बदनाम अंडाकार जेल में भेजा गया। काले पानी की सजा के समय ही उन्हें क्षय रोग (टीबी) हो गया था जिससे वे मृत्यु को प्राप्त होते होते बचे। कारागार में बटुकेश्वर दत्त ने सन 1933 एवं सन 1937 में फेमस हंगर स्ट्राइक की। अंडाकार जेल से 1937 में वे पटना की बांकीपुर सेंट्रल जेल में लाए गए एवं सन 1938 में मुक्त कर दिए गए। काले पानी से टीबी की गंभीर मर्ज लेकर लौटे बटुकेश्वर, अपने उपचार के बाद गांधी जी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। जहां उन्हें फिर से अरेस्ट कर लिया गया। 4 वर्ष बाद सन 1945 में वे मुक्त हो गए।

 

 

बटुकेश्वर दत्त की पत्नी – Batukeshwar Datt Wife :-

सन 1947 में भारत आजाद हो गया। नवम्बर, 1947 में बटुकेश्वर ने अंजली दत्त से मैरिज कर ली एवं पटना में रहने लगे। मगर उनके जीवन का संघर्ष चलता रहा। कभी सिगरेट कम्पनी एजेंट तो कभी-कभी पर्यटकों का गाइड बनके उन्हें पटना की सड़कों पर धूल फांकनी पड़ी। आजादी के लिए 15 वर्ष कारागार में गुजारने वाले बटुकेश्वर को स्वतंत्र भारत में एक कारोबार मिला भी तो एक सिगरेट कम्पनी में एजेंट का,बाद में उन्होंने डबलरोटी और बिस्कुट का एक छोटा कारखाना भी खोला, मगर उसमें बहुत घाटा हो गया एवं वह शीघ्र ही बन्द हो गया। थोड़े टाइम तक पर्यटकों के एजेंट और बस परिवहन का कार्य भी किया, परन्तु इन कार्यों में कोई सफलता उनके हाथ नहीं लगी।

 

 

जब उन्हें कमिश्नर ने कर दिया पहचानने से इंकार –

आपको बता दें कि एक दफा पटना में बसों के लिए परमिट प्राप्त हो रहे थे। बटुकेश्वर ने भी आवेदन कर दिया। परंतु जब परमिट के लिए कमिश्नर के सामने उनकी पेशी हुई तो उनसे बोला गया कि वो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का प्रमाण-पत्र लेकर आएं। यद्यपि बाद में जब प्रेसिडेंट राजेंद्र प्रसाद को यह बात पता लगी तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर दत्त से माफी मांगी। बटुकेश्वर ने अपने जीवन में किसी से सरकारी सहायता नहीं मांगी, मगर 1963 में उन्हें एमएलसी (विधान परिषद सदस्य) बना दिया गया। पर फिर भी उनके हालात में अधिक सुधार नहीं आया।

 

किताब : बटुकेश्वर दत्त, भगत सिंह के सहयोगी

बटुकेश्वर की जिंदगी के इन अनसुने पक्षों का स्पष्टीकरण नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा पब्लिश एक बुक “बटुकेश्वर दत्त, भगत सिंह के सहयोगी” में मिलता है। अनिल वर्मा के द्वारा लिखित यह संभवतया ऐसी पहली किताब है, जो उनकी जिंदगी की प्रामाणिक दस्तावेज होने के साथ साथ स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के उपरांत जीवन के संघर्ष को स्पष्ट करती है।

 

बटुकेश्वर दत्त के अंतिम दिन

आपको बता दें कि जब सन 1964 में Batukeshwar Datt के अस्वस्थ होने पर उन्हें पटना के एक गवर्नमेंट हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया परंतु वहां उन्हें एक बिस्तर तक नसीब नहीं हुआ। तभी इस बात से क्षुब्ध होकर बटुकेश्वर के मित्र और एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चमनलाल आजाद ने एक न्यूजपेपर के लिए गुस्से से भरा अपना एक आर्टिकल भी लिखा था, जिसमें उन्होंने लिखा।
“हिंदुस्तान इस क़ाबिल ही नहीं है कि यहाँ कोई क्रांतिकारी जन्म ले। ईश्वर ने बटुकेश्वर दत्त जैसे वीर को भारत में पैदा करके बहुत बड़ी भूल की है। जिस स्वतंत्र भारत के लिए उसने अपनी सारी जिंदगी लगा दी, उसी स्वतंत्र भारत में उसे जीवित रहने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ रहा है।”

बताते हैं कि इस आर्टिकल के पेपर में छपने उपरांत सत्ता के गलियारों में थोड़ी उथल-पुथल हुई। तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा एवं पंजाब प्रांत के मिनिस्टर भीमलाल सच्चर ने चमनलाल आजाद से भेंट की।एवं पंजाब सरकार ने बिहार सरकार को एक हज़ार रुपये का चेक भेजकर वहां के सीएम केबी सहाय को लिखा कि अगर पटना में बटुकेश्वर दत्त का उपचार नहीं हो सकता है तो स्टेट गवर्नमेंट दिल्ली अथवा चंडीगढ़ में उनके उपचार का खर्च उठाने के लिए तैयार है।

इस पर बिहार सरकार हरकत में आयी। बटुकेश्वर दत्त के उपचार पर गौर दिया जाने लगा। लेकिन उस समय तक उनकी कंडीशन इतनी बिगड़ चुकी थी। कि 22 नवम्बर 1964 को उन्हें दिल्ली लाना ही पड़ा। यहाँ पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से बोला कि उन्होंने सपने में भी यह नहीं सोचा था कि जिस दिल्ली में असेंबली में उन्होंने बम फोड़ा था वहीं वे एक विकलांग की भांति स्ट्रेचर पर लाए जाएंगे। बटुकेश्वर दत्त को सफदरजंग हॉस्पिटल में एडमिट करा गया। बाद में पता लगा कि उनको कैंसर है एवं उनकी लाइफ के कुछ दिन ही बाकी हैं। थोड़े टाइम बाद पंजाब प्रांत के सीएम रामकिशन उनसे मिलने पहुंचे। छलछलाती आंखों के साथ बटुकेश्वर दत्त ने सीएम से कहा, ‘मेरी यही अन्तिम कामना है कि मेरा दाह संस्कार मेरे दोस्त भगत सिंह की समाधि के पास में किया जाए। ‘

 

बटुकेश्वर दत्त का देहांत – Batukeshwar Datt Death

उनकी कंडीशन कंटीन्यूसली बिगड़ती गई। 17 जुलाई 1965 को वे कोमा में चले गये एवं 20 जुलाई वर्ष 1965 की रात्रि एक बज के 50 Minute पर नई दिल्ली स्थित AIIMS (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) में उनका निधन हो गया। बटुकेश्वर दत्त की अन्तिम इच्छा को ध्यान में रखते हुए उनका अन्तिम संस्कार भारत-पाक सीमा के करीब पंजाब के हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू एवं सुखदेव की समाधि के पास करा गया है।

बटुकेश्वर के विधान परिषद में सहयोगी रहे इन्द्र कुमार बताते हैं कि ‘स्व॰ बटुकेश्वर दत्त राजनैतिक उच्चाकांक्षा से दूर शांतचित्त और अपने देश की खुशी के लिए सदैव चिन्तित रहने वाले स्वतंत्रता सेनानी थे।’ मातृभूमि के लिए इस प्रकार का जज्बा रखने वाले नौजवानों का इतिहास भारत के अतिरिक्त किसी और देश की हिस्ट्री में मौजूद नहीं है। मगर Batukeshwar Datt के साथ तो इन सबसे भी ज्यादा बुरा हुआ।स्वतंत्र भारत में न जीते जी उनकी कोई पूछ रही एवं न ही उनकी स्मृति का कोई मोल मालूम पड़ता है।

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