करतार सिंह सराभा – Kartar Singh Sarabha Biography In Hindi

 

kartar Singh Sarabha एक ऐसे क्रांतिकारी जिन्हें भगत सिंह मानते थे अपना गुरू 

 

शहीद-ए-आज़म भगत सिंह आज करोड़ों युवाओं के आदर्श और गुरु है। जो महान शख्सियत दुनिया से दूर हो कर भी करोड़ों युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं, उन्होंने भी अपने जीवनकाल में किसी से प्रेरणा ली थी। भगत सिंह के बारे में तो आज सभी जानते हैं लेकिन उनके गुरु को काफी कम लोग जानते हैं। भगत सिंह जिन्हें अपना हीरो मानते थे वो और कोई नहीं बल्कि Shaheed Kartar Singh Sarabha ही थे। करतार सिंह सराभा मात्र 19 साल की उम्र में ही शहीद हो गए थे। अपने छोटे से जीवनकाल में ही इन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा रखी थी। क्रांतिकारी करतार सिंह ने अपने साथियों के साथ मिल कर देश से अंग्रेजों को निकाल फेंकने की पूरी तैयारी कर ली थी। यदि साथी ने गद्दारी नहीं की होती तो शायद आज भारत का इतिहास कुछ और होता! 

 

कौन थे शहीद करतार सिंह सराभा ? who was kartar singh sarabha ?

 

क्रांतिकारी आंदोलन में नई जान डालने वाले Kartar Singh Sarabha का जन्म पंजाब के सराभा गांव में लुधियाना जिले के एक संपन्न परिवार में 24 मई 1896 को हुआ था। इनके मां का नाम साहिब कौर और पिता का नाम मंगल सिंह था। दादा बदन सिंह ग्रेवाल 300 एकड़ जमीन के मालिक थे। मां और पिता खेतीबाड़ी करते थे। पांच साल की उम्र में ही पिता की मृत्यु हो गई। नन्हा करतार पिता की मौत के सदमे से उबर ही रहा था कि मां साहिब कौर भी दुनिया से चल बसी। मात्र आठ साल की उम्र में ही मां-बाप का साथ छूटने के बाद करतार सिंह के परवरिश की जिम्मेदारी दादा बदन सिंह के ऊपर आ गई। 

 

दादा बदन सिंह पढ़ाई की अहमियत जानते थे। करतार सिंह की शुरुआती पढ़ाई गांव से ही हुई। आगे की पढ़ाई के लिए लुधियाना के मालवा खालसा हाई स्कूल में उनका दाखिला हुआ। नौवीं के बाद दसवीं में बेहतर पढ़ाई के लिए वह उड़ीसा में अपने चाचा के यहां चले गए। उड़ीसा में उन्होंने रावेनशॉ यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया और यहीं से दसवीं की परीक्षा पास की।  

 

दादा और चाचा ने आगे की पढ़ाई के लिए करतार सिंह को अमेरिका भेजने का फैसला किया। जुलाई 1912 में वह अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को के लिए रवाना हो गए। पढ़ाई के साथ ही करतार सिंह मील फैक्ट्री में काम भी करते थे। पढ़ाई के सिलसिले में ही वह भारतीय छात्रों द्वारा बनाए गए नालंदा क्लब से जुड़ गए। इसी क्लब में किशोर करतार सिंह के अंदर क्रांतिकारी करतार सिंह का जन्म हुआ। 

 

छात्र करतार सिंह क्रांतिकारी kartar singh कैसे बने?

 

अमेरिका की धरती पर कदम रखते ही उन्हें अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा। जब वह फैक्ट्री में काम करने लगे तब उन्हें अंग्रेजों द्वारा मजदूरों पर किए जा रहे अत्याचार का सामना भी करना पड़ा। नस्लीय भेदभाव और अत्याचार की वजह से ही करतार सिंह के दिल में अंग्रेजों के खिलाफ नफरत के बीज अंकुरित होने लगे। 

 

अमेरिका में करतार सिंह की मुलाकात Lala Hardayal Singh से हुई। हरदयाल सिंह पहले से ही अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के लिए एक मजबूत संगठन खड़ा करने की कोशिश में लगे हुए थे। 25 मार्च 1913 को ऑरेगन राज्य में क्रांतिकारियों की एक बैठक हुई। लाल हरदयाल ने बैठक को सबोंधित करते हुए कहा कि भारत की आजादी के लिए ऐसे युवाओं की जरूरत है जो मौका आने पर अपनी जान भी कुर्बान कर सके! इतना सुनते ही 17 साल के करतार सिंह खड़े हो गए। करतार सिंह के जज्बे को देख हरदयाल सिंह ने उन्हें अपने गले से लगाया। इस बैठक के बाद अगले महीने ही 21 अप्रैल को गदर पार्टी का गठन हुआ। पार्टी का एक ही मकसद था ‘अंग्रेजों की गुलामी से आज़ादी’ भले ही इसके लिए हथियार ही क्यों ना उठाना पड़े। 

 

अंग्रेजों के जुल्म की खबर लोगों तक पहुंचाने और देश विदेश में रह रहे भारतीय लोगों के दिलों में आज़ादी का जज़्बा पैदा करने के मकसद के साथ गदर नाम से एक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। ज्यादा से ज्यादा लोगों को आजादी के लिए जागरूक करने के लिए पत्रिका को इंग्लिश के अलावा हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बंगाली, गुजराती और पश्तो भाषा में गदर का प्रकाशन किया जाने लगा। पत्रिका के प्रकाशन की पूरी जिम्मेदारी करतार सिंह के ऊपर थी। करतार सिंह खुद भी लेख और कविता के माध्यम से लोगों तक अपनी बात पहुंचाते थे। 

 

अमेरिका में पैदा हुई क्रांति की ज्वाला भारत कैसे पहुंची? 

 

1914 में प्रथम विश्व युद्ध के शुरू होते ही अंग्रेजी सेना दूसरे देशों के साथ युद्ध में उलझी हुई थी। इसे बेहतरीन मौका मानते हुए करतार सिंह, हरदयाल सिंह और गदर पार्टी के दूसरे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के साथ जमीनी लड़ाई के लिए भारत आने का फैसला किया। नवंबर 1914 में करतार सिंह अपने साथियों के साथ कोलंबो पहुंचे और फिर वहां से मद्रास होते हुए पंजाब पहुंच गए। 

 

बनारस में उन्होंने रास बिहारी बोस से मुलाकात की और बैठक के लिए पंजाब आने का न्योता दिया। विष्णु पिंगले के साथ मिल कर अंग्रेजी फौज में बगावत की एक योजना बनाई। अंग्रेजी फौज में जबरन भर्ती किए गए भारतीय इस बगावत के लिए तैयार हो गए। 25 जनवरी 1915 को रास बिहारी बोस अमृतसर पहुंच गए। 12 फरवरी को एक अहम बैठक हुई और इसी बैठक में 21 फरवरी 1915 को बगावत का दिन तय हुआ। 

 

बगावत का अंजाम क्या हुआ?  

 

बगावत की सारी तैयारियां हो चुकी थी। हजारों क्रांतिकारी वतन पर मर मिटने को तैयार थे लेकिन, किरपाल सिंह नाम के एक गद्दार ने सारे किए कराए पर पानी फेर दिया। किरपाल सिंह ने योजना की सारी जानकारी पुलिस को दे दी। जैसे ही करतार सिंह को खबर मिली कि 21 फरवरी को होने वाले बगावत की जानकारी पुलिस को मिल चुकी है, उन्होंने बगावत की तारीख बदल कर 19 फरवरी कर दिया। गद्दारों ने इस तारीख की जानकारी भी पुलिस को दे दी। गद्दारी से बेखबर क्रांतिकारी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के लिए निकल पड़े। करतार सिंह अपने सौ क्रांतिकारी साथियों के साथ फिरोजपुर छावनी की ओर निकल पड़े। 

 

ज्यादातर क्रांतिकारियों को बीच रास्ते से ही गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजी फौज में शामिल भारतीय सैनिकों से हथियार छीन लिए गए। किरपाल सिंह की गद्दारी की वजह से बगावत की सारी योजना असफल हो गई। करतार सिंह के भी ज्यादातर साथियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, हालांकि करतार सिंह अपने तीन चार साथियों के साथ अंग्रेजों से बच निकलने में कामयाब रहे। 

 

गदर पार्टी ने करतार सिंह और दूसरे क्रांतिकारियों को अफ़ग़ानिस्तान जाने का ऑर्डर दिया। करतार सिंह अफ़ग़ानिस्तान के लिए निकल पड़े, लेकिन आंदोलन को इस तरह से छोड़ कर छुपना उन्हें गवारा नहीं हुआ। 2 मार्च 1915 को करतार सिंह दो क्रांतिकारी के साथ मौजूदा पाकिस्तान के सरगोधा शहर में लौट आएं। सरगोधा में भी वह सैनिकों में क्रांति की ज्वाला फूंकते रहे। करतार सिंह अंग्रेजों को हराने की हर मुमकिन कोशिश करते रहे लेकिन हर बार उन्हें अपनो से हार मिलती रही। एक बार फिर गंडा सिंह नाम के शख्स ने गद्दारी की और करतार सिंह और उनके दो साथियों को गिरफ्तार करवा दिया। 

 

गिरफ्तारी के बाद उन्हें लगभग 5 महीने तक जेल में तमाम यातनाएं दी गई। अंग्रेजों की अदालत में करतार सिंह के खिलाफ 26 अप्रैल 1915 से 13 सितंबर 1915 तक केस चला। अंततः अदालत ने करतार सिंह और 24 दूसरे क्रांतिकारियों को राजद्रोह, डकैती और कत्ल का आरोपी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई। 

16 नवंबर 1915 को Kartar Singh Sarabha समेत उनके 6 साथियों को लौहर के जेल में फांसी दे दी गई। मात्र 19 साल की उम्र में ही करतार सिंह ने देश पर अपनी जान कुर्बान कर दी। 

 

 

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