Lala Hardayal – लाला हरदयाल कि जीवनी

Lala Hardayal Singh ने अपनी क़लम की ताक़त से अंग्रेजी सरकार की नींव हिला दी थी

भारत माता की इस धरती पर सैकड़ों ऐसे क्रांतिकारी पैदा हुए, जिन्होंने हंसते हंसते वतन पर अपनी जान कुर्बान कर दी। सभी क्रांतिकारियों ने अपने अपने तरीके से लड़ कर देश को आजादी दिलाई है।

कुछ क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्होंने हथियार के दम पर अंग्रेजी सरकार को झुकने पर मजबूर किया। तो वहीं कुछ क्रांतिकारियों ने अपने क़लम के दम अंग्रेजी सरकार की नींद उड़ाई।  

क़लम के दम पर देश की आज़ादी में योगदान देने वाले क्रांतिकारियों में Lala Har Dayal Singh एक बड़ा नाम है। 

Har Dayal Singh वो क्रांतिकारी हैं जिन्होंने विदेशों में रहने वाले भारतीय को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट किया और फिर भारत की आजादी के उद्देश्य से गदर पार्टी की स्थापना की। 

आज़ाद भारत का सपना लिए इस महान हस्ती ने देश की आज़ादी से पहले ही दुनिया को अलविदा कह दिया। आज़ाद भारत में खुल कर सांस लेने की चाहत रखने वाले Lala Hardayal Singh को अपने मात्रभूमि पर अंतिम सांस भी नसीब नहीं हुई। 

Lala Hardayal Biography 

कौन थे अंग्रेजों की नींद उड़ाने वाले Lala Hardayal Singh ? 

देश की आज़ादी का सपना ले कर विदेशों में घूम घूम कर भारतीय को एकजुट करने वाले Har Dayal Singh का जन्म 14 अक्टूबर 1884 में दिल्ली में हुआ था। 

इनके मां का नाम भोली रानी और पिता का नाम गौरी दयाल माथुर था। 

पिता जिला अदालत में Reader के पद पर कार्यरत थे। शुरुआती पढ़ाई कैम्ब्रिज मिशन स्कूल से हुई। 

दिल्ली के संत स्टीफ़न कॉलेज से संस्कृत में स्नातक की डिग्री हासिल की। पंजाब यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री भी संस्कृत में ही हासिल किया। 1905 में संस्कृत में आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से बोडेन स्कॉलरशिप मिला। स्कॉलरशिप मिलने के बाद Har Dayal सिंह इंग्लैंड चले गए। 

वहां उन्होंने संत जॉन कॉलेज में एडमिशन लिया। इंग्लैंड जाने से पहले ही हरदयाल सिंह क्रांतिकारी मास्टर अमीरचन्द के संपर्क में आ चुके थे। उन्होंने अमीरचंद के क्रांतिकारी संस्था की सदस्यता भी ले ली थी।

अंग्रेजों के स्कॉलरशिप पर इंग्लैंड जाने वाले Lala Har dayal को अंग्रेजों से नफ़रत कब हुई? 

हरदयाल सिंह बचपन से ही अंग्रेजों के अत्याचार से परिचित थे, लेकिन पहले उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी। जब हरदयाल सिंह ने इंग्लैंड में क़दम रखा, तब उन्हें अंग्रेजों द्वारा किए जाने वाले भेदभाव का शिकार होना पड़ा। 

अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे भेदभाव और शोषण को बर्दाश्त करना Hardayal Singh के लिए असंभव हो चुका था। इंग्लैंड जाने के दो साल बाद ही 1907 में उन्होंने राष्ट्रवादी जर्नल The Indian Sociologist को एक ख़त लिखा। 

इस ख़त में हरदयाल सिंह ने अंग्रेजी सरकार की कड़ी आलोचना की थी। इस खत के प्रकाशित होने के बाद वह ब्रिटिश पुलिस के रडार पर आ गए थे। 

इंग्लैंड में ही हरदयाल सिंह की मुलाकात क्रांतिकारी संस्था इंडिया हाउस के संस्थापक श्यामजी कृष्ण वर्मा से हुई। इंडिया हाउस के माध्यम से हरदयाल सिंह की मुलाकात कई और महान क्रांतिकारियों से हुई। 

समय के साथ साथ हरदयाल सिंह का क्रांतिकारी जज़्बा भी बढ़ता गया।  इंग्लैंड में हरदयाल सिंह सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे थे और उन्हें अंग्रेजी सरकार की तरफ से ऑफिसर का एक पद भी ऑफर किया गया था। अंग्रेजों का अत्याचारी रवैया देखने के बाद हरदयाल सिंह के दिल में अंग्रेजों के प्रति नफ़रत बढ़ती गई। इसी नफ़रत के कारण उन्होंने ऑफिसर का पद और स्कॉलरशिप भी ठुकरा दिया और पढ़ाई अधूरी छोड़ कर 1908 में भारत वापस आ गए। 

भारत आने के बाद लाला हरदयाल सिंह ने क्या किया ? 

भारत आने के बाद उन्होंने पुणे में क्रांतिकारी बाल गंगाधर तिलक और फिर लाहौर में लाला लाजपत राय से मुलाकात की। क्रांतिकारियों से मुलाकात के बाद उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ अपने क़लम को हथियार बनाने का फैसला किया। हरदयाल सिंह अंग्रेजी सरकार के खिलाफ लेख लिखने लगे। अपने लेख के जरिए वो लोगों से एक जुट होने की भी अपील करते रहे। थोड़े ही समय बाद वह पंजाब नाम के अंग्रेजी समाचार पत्र के संपादक बन गए। 

हरदयाल सिंह के लेख से अंग्रेजी सरकार बौखला गई। बौखलाहट में उसने हरदयाल सिंह के लेख पर प्रतिबंध लगा दिया और उनके गिरफ्तारी पर विचार करने लगी। लाला लाजपत राय को अंग्रेजी सरकार के मंसूबे की खबर लग गई। उन्होंने तुरंत हरदयाल सिंह से मुलाकात की और उन्हें देश छोड़ देने को कहा। हरदयाल सिंह को देश छोड़ना मंजूर नहीं था। लाजपत राय ने उन्हें समझाया कि, उनके शब्द दुनिया के किसी कोने से भी भारतीय लोगों तक पहुंच सकती है। अगर क्रांति की ज्वाला जलाए रखनी है तो फिर उन्हें देश छोड़ कर जाना ही होगा। अंततः देश की भलाई के लिए हरदयाल सिंह देश छोड़ कर जाने के लिए तैयार हो गए। 

देश छोड़ कर हरदयाल सिंह कहां गए ? 

1909 में भारत छोड़ कर हरदयाल सिंह पेरिस चले गए। पेरिस में क्रांतिकारियों से उनकी मुलाकात हुई और वह वन्दे मातरम् नाम की राष्ट्रवादी पत्रिका के संपादक बन गए। वन्दे मातरम् पत्रिका ने लोगों में क्रांतिकारी जज़्बा पैदा किया। हालांकि पेरिस में उन्हें लोगों से ज्यादा समर्थन नहीं मिला। इससे निराश हो कर 1910 में अल्जीरिया चले गए। कुछ समय अल्जीरिया में रहने के बाद फ्रांस के दूर दराज आइलैंड मार्टिनिक चले गए। यहां हरदयाल सिंह एक संन्यासी की तरह रहने लगे। मार्टिनिक जाने के बाद उन्होंने सभी क्रांतिकारियों से संबंध खत्म कर लिया था। 

संन्यासी हरदयाल सिंह वापस से क्रांतिकारी हरदयाल सिंह कैसे बने ? 

भाई परमानंद उन्हें ढूंढ़ते हुए मार्टिनिक पहुंच गए। हरदयाल सिंह के जीवन पर आर्य समाज का बचपन से ही गहरा प्रभाव था। भाई परमानंद ने उन्हें क्रांति की राह पर वापस आने और साथ ही आर्य समाज का प्रचार प्रसार करने का आग्रह किया। हरदयाल सिंह ने परमानंद के आग्रह को मान लिया। 

1911 में हरदयाल सिंह अमेरिका पहुंच गए। अमेरिका पहुंचने के बाद उन्होंने फिर से लेख लिखना शुरू किया। उनके लेख का प्रकाशन मॉडर्न रिव्यू पत्रिका में होता था। अमेरिका में ही इन्होंने कार्ल मार्क्स को पढ़ना शुरू किया और कार्ल मार्क्स से काफी ज्यादा प्रभावित भी हुए।  कैलिफोर्निया में रहते हुए उनकी मुलाकात भारतीय क्रांतिकारियों से होती रही। 

23 दिसंबर 1912 हरदयाल सिंह समेत तमाम क्रांतिकारियों के लिए एक बड़ा दिन साबित हुआ। इसी तारीख को दिल्ली में रास बिहारी बोस, बसंत विश्वास और अमीचंद ने वायसराय लॉर्ड हॉर्डिंग पर बम से हमला किया था। इस घटना से हरदयाल सिंह काफी खुश हुए और भारतीय छात्रों के बीच जा कर उन्होंने खूब जश्न मनाया। 

अमेरिका में रह रहे क्रांतिकारियों ने अब अंग्रेजों से  सामने से लड़ने का फैसला किया। हरदयाल सिंह समेत दर्जनों क्रांतिकारियों ने मिल कर 1913 में गदर पार्टी की स्थापना की। पार्टी अपने उद्देश्य में लगी रही और हरदयाल सिंह लोगों को एकजुट करने में। इस बीच अप्रैल 1914 को ब्रिटिश सरकार के कहने पर अमेरिका में हरदयाल सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया।  जमानत मिलने के बाद हरदयाल सिंह जर्मनी चले गए। 

कुछ साल जर्मनी में रहने के बाद वह स्वीडन चले गए। दस साल से ज्यादा स्वीडन में रहने के बाद 1927 में हरदयाल सिंह उसी लंदन में पहुंच गए जहां से उनके क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत हुई थी। यहां उन्होंने लंदन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री हासिल की। 

पीएचडी के बाद वह लंदन में ही रहने लगे। इन्होंने धर्म, शिक्षा, मानवता और अपने क्रांतिकारी अनुभव पर कई किताबें लिखी।  

भारत आगमन से पहले ही रहस्यमई मौत – Lala Hardayal Death

विदेश में रहते हुए हरदयाल सिंह को भारत में लाने की कई कोशिश हुई लेकिन अंग्रेजी सरकार उनके आगमन से डरती थी। 

इस वजह से हरदयाल सिंह को भारत आने की कभी इजाज़त नहीं दी गई। अंततः 1938 में सरकार से इजाज़त मिलने के बाद हरदयाल सिंह को भारत लाने की तैयारी होने लगी। लंदन से अमेरिका होते हुए उन्हें भारत आना था। अमेरिका के फ़िलाडेल्फ़िया शहर में उन्हें एक प्रोग्राम में हिस्सा लेना था। 

4 मार्च 1938 को उन्होंने प्रोग्राम में हिस्सा लिया और भाषण भी दिया। प्रोग्राम खत्म होने के बाद 4 मार्च 1938 को ही रहस्यमई तरीके से 54 साल की उम्र में लाला हरदयाल सिंह की मौत हो गई। मौत से पहले वह बिल्कुल स्वस्थ थे।

माना जाता है कि Lala Hardayal Singh की मौत एक बड़ी साजिश थी। अंग्रेजों ने योजनाबद्ध तरीके से उन्हें भारत आने की इजाज़त दी और फिर उनके फ़िलाडेल्फ़िया जाने का इंतजार किया। फ़िलाडेल्फ़िया में उन्हें ज़हर दे कर मार दिया गया! आधिकारिक तौर पर मौत की वजह ढूंढने की कभी कोशिश ही नहीं की गई। जिस वजह से लाला हरदयाल सिंह के मौत की सच्चाई कभी सामने नहीं आ सकी। 

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