maharaja surajmal

Maharaja Surajmal एक महान जाट शासक

महाराजा सूरजमल एक ऐसे भारतीय शासक थे जिनके नाम से मुगलों के पैर काँपते थे। महाराजा सूरजमल के शौर्य और पराक्रम को नमन करते हुए जाट लोगों ने इन्हें अपने भगवान की तरह पूजा। 

आज हम Maharaja Surajmal के जीवन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में बात करने वाले हैं। 

 

 

Maharaja Surajmal का शुरुआती जीवन

महाराजा सूरजमल का जन्म 13 फरवरी 1707 को राजस्थान के भरतपुर में हुआ था। पिता जी का नाम बदन सिंह था। हालांकि कुछ इतिहासकारों का यह मत भी है कि बदन सिंह ने Surajmal को गोद लिया था।

बदन सिंह भरतपुर राज्य के शासक थे। उन्होंने भरतपुर में करीब 20 वर्ष तक शासन किया लेकिन एक उम्र के बाद उनकी आंखों की दृष्टि कमजोर हो गई थी।

जिसकी वजह से उन्हें ऐसा लगने लगा कि वह युद्ध आदि लड़ने में सक्षम नहीं है। इस वजह से उन्होंने अपना पद भार छोड़ दिया और अपने पुत्र को राजगद्दी सौंप दी।

 

 

महाराजा सूरजमल का परिवार ( Maharaja Surajmal Family )

महाराजा सूरजमल एक जाट राजा थे, जिसके पिता का नाम बदन सिंह और माँ का नाम महारानी देवकी था। इनका विवाह महारानी किशोरी देवी के साथ हुआ था। 

इन्हें कुल पाँच संताने थे जिनमें सभी पुत्र थे। इनका नाम जवाहर सिंह,नाहर सिंह,रतन सिंह, नवल सिंह, रंजीत सिंह था। 

 

 

महाराजा सूरजमल का कौशल और सेना

सूरजमल काफी कुशाग्र बुद्धि के थे और राजनीतिक कुशलता उन्हें बहुत अधिक थी इसी वजह से उन्होंने बहुत ही जल्द आगरा, मेरठ, अलीगढ़ आदि को अपने राज्यों में शामिल कर लिया था। 

महाराजा सूरजमल मानते थे कि एक मजबूत राजा वही हो सकता है जिसके पास एक मजबूत सेना हो इसलिए उन्होंने अपनी सेना को मजबूत करने के लिए भरसक प्रयास किए।

 यही वजह है कि उस दौर में उनकी सेना हिंदुस्तान की सबसे सशक्त सेना में से एक मानी जाती थी। इनकी सेना में करीब 1500 घुड़सवार सैनिक होते थे और 25000 से भी ज्यादा पैदल सैनिक थे।

 

 

मराठाओं को Maharaja Surajmal का साथ न लेना पड़ा भारी

 बात 14 जनवरी सन 1761 की है जब पानीपत का तीसरा विश्व युद्ध हुआ था। इस तीसरे युद्ध में करीब एक लाख मराठा सैनिक शामिल हुए थे।

लेकिन युद्ध में करीब आधे से ज्यादा मराठा सैनिक मारे गए थे। मराठा सैनिकों के हालात इस कदर खराब हो गई थी कि उनके पास खाने का राशन तक नहीं था।

 यह युद्ध सदाशिवराव भाऊ और अहमद शाह अब्दाली के बीच लड़ा गया था। जब यही युद्ध शुरुआत शुरू नहीं हुआ था और युद्ध की योजनाएं बनाई जा रही थी, उस वक्त सदा शिव राव भाऊ को पेशवा बालाजी बाजीराव भाऊ में यह परामर्श दिया था कि उन्हें उत्तर भारत के शक्ति के रूप में उभर रहे सूरजमल के साथ एक परामर्श स्थापित करना चाहिए।

लेकिन सदाशिव राव भाऊ ने उनकी बात नहीं मानी और वह अकेले ही युद्ध के लिए निकल पड़े। हो सकता है यदि उस वक्त सदाशिव राव भाऊ ने सूरजमल के साथ मिलकर  यह युद्ध लड़ा होता तो आज भारत का इतिहास कुछ और होता।

 

 

मराठा सैनिकों पर दिखाई उदारता. 

महाराजा सूरजमल ने बिना किसी भेदभाव के मराठा सैनिकों की जमकर के मदद की।  घायल हुए सैनिकों का उपचार करवाया।

जिन सैनिकों के पास खाने आदि की सामग्री नहीं थी उनके लिए अन्न एकत्रित करके अन्न की व्यवस्था करवाई गई।

कुछ सैनिक ऐसे भी थे जो युद्ध के दौरान अपने पूरे परिवार के साथ आए थे लेकिन युद्ध के वक्त उनकी मृत्यु हो गई थी।

महाराजा सूरजमल ने ऐसी विधवा महिलाओं को अपने राज्य में ही शरण दिया और वहीं पर उनको घर बनवाया। सैनिकों को सैनिकों को जरूरत के हिसाब से धन दिया और फिर उन्हें उनके राज्य के लिए विदा किया।

 

 

दिल्ली युद्ध मे दिखाई वीरता. 

महाराजा सूरजमल के जीवन की अधिकतर घटनाएँ उनके राजकवि सूदन के द्वारा लिखी जाती थी। सूदन ने इस युद्ध का विवरण ‘सुजान चरित्र’ नाम के एक ग्रंथ में किया है। 

उन्होंने इसमे लिखा है कि 1753 में वैशाख के महीने में अपने कुशल सैनिकों के साथ दिल्ली के लिए निकले थे।

दिल्ली मुगलों के अधीन था दिल्ली उस वक्त मुगल साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी। इस वजह से दिल्ली काफी धनवान भी था।

 इसी बात को ध्यान में रखकर महाराजा सूरजमल ने दिल्ली के ऊपर चढ़ाई की थी सूरजमल और मुगल शासक के बीच दिल्ली में यह युद्ध कई महीनों तक चलता रहा।

जिसके बाद कार्तिक महीने में सूरजमल दिल्ली में प्रवेश करने में सफल हुए और दिल्ली में मौजूद  धन संपत्ति को ने लूट लिया था। 

 

 

महाराजा सूरजमल के मृत्यु

अपने इस छोटे से जीवनकाल में इन्होंने ऐसे काम किये थे जिसके लिए देश इन्हें हमेशा याद रखेगा। 

जिस दौर में राजस्थान के राजपूत राजा मुगलों के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो रहे थे उसी दौर में राजस्थान के एक मात्र जाट राजा ने मुगलों के गढ़ में जाकर लूटपाट मचाई थी। इतिहास की बातो के अनुसार 25  दिसम्बर 1763  के दिन हिंडन नदी के पास मैं नजीबुद्दौला की सेना के साथ  मैं युद्द करते समय maharaja surajmal ka qatal कर दिया गया।  और इस तरह महाराजा वीर गति को प्राप्त हुए।  

ऐसे शूरवीर राजा को देश हमेशा याद रखेगा। 

 

 

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2 thoughts on “Maharaja Surajmal एक महान जाट शासक”

  1. धन्यवाद आपके द्वारा दी गयी जानकारी की लिए

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