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Shaheed Udham Singh का जीवन परिचय तथा जलियांवाला बाग हत्याकांड

उधम सिंह का जीवन परिचय – Udham Singh Biography

 

हमारे देश का इतिहास कई गुमनाम शूरवीरों से भरा हुआ है जिन्हें उतनी पहचान नही मिलती है जितनी उन्हें मिलनी चाहिए। उन्ही कुछ महान लोगो मे से एक Udham Singh है।

जलियांवाला बाग हत्याकांड ने जब पूरे देश को हिला कर रख दिया था, जिस हत्याकांड के बाद कई क्रांतिकारियों के अंदर प्रतिशोध की आग जलने लगी थी उन्ही में से एक Shaheed Udham Singh है।

 

आज हम इस महान क्रांतिकारी उधम सिंह का Biography जानेंगे. 

 

शहीद उधम सिंह का परिवार तथा प्रारंभिक जीवन – Shaheed Udham Singh Family & Life

 

उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पटियाला के सुनाम नामक गांव में हुआ था। आज  समय मैं यह गांव पंजाब राज्य के एक जिले में  पड़ता हैं।  

उधम सिंह के पिता  का नाम तेहाल सिंह कंबोज था तथा उनकी माता का नाम नरेन कौर था। उधम सिंह के बालयावस्था  का नाम शेर सिंह था बाद मैं आगे के समय मैं  इनका नाम उधम सिंह पड़ गया।

उधम सिंह के पिता उस जमाने में रेलवे में वॉचमैन की ड्यूटी करते थे उनकी ड्यूटी पास के ही एक गांव उपली में रेलवे क्रॉसिंग में लगी हुई थी।

उधम सिंह का एक भाई भी था जिसका नाम मुक्त सिंह था। उधम सिंह और उनके भाई माता पिता का प्यार का पाने में थोड़ा बदकिस्मत थे, क्योंकि सन 1901 में उनकी माता का देहांत हो गया था उसके बाद सन् 1907 में उनके पिता का देहांत हो गया था जिसके बाद दोनों भाई अनाथ हो चुके थे।

 

उनके ऊपर से माता पिता का साया उठने के बाद उधम सिंह और मुक्त सिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में रखा गया। यहीं पर इन दोनों की शिक्षा दीक्षा हुई।

 

शिक्षा के दौरान ही उधम सिंह जिनका बचपन का नाम शेर सिंह था, बाद मैं बदलकर उधम सिंह रहा गया। उधम सिंह ने 1918 में अपनी मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली थी जिसके बाद वह 1919 में अनाथालय छोड़ चुके थे।

 

क्रांतिकारी विचारों का जन्म

 

उधम सिंह का जीवन बचपन से ही कष्टों में बीता था जिसकी वजह से उनके अंदर देश के प्रति एक जज्बा था। लेकिन इस जज्बे को बदले की आग में बदलने का काम जलियांवाला बाग हत्याकांड ने किया।

बात सन 1919 की है जब जलियांवाला बाग में करीब 20000 लोग एक सभा में इकठ्ठे हुए थे। वह लोग निहत्थे थे। इस सभा में बच्चे बूढ़े महिलाएं सभी शामिल हुए थे।

उधम सिंह का काम यहां पर लोगों के लिए पानी की व्यवस्था करना था। वह इसी व्यवस्था में लगे हुए थे तभी करीब 90 से 100 अंग्रेज सिपाही आते हैं और एकाएक गोलियों की बौछार करना शुरू कर देते हैं।

वह बाग जहां पर कुछ लोग देश की आजादी की उम्मीद लगाए बैठे हुए थे देखते ही देखते कुछ ही मिनट में लाशों के ढेर में तब्दील हो जाता है।

यह घटना उधम सिंह के जीवन को बिल्कुल बदल करके रख देती है उधम सिंह इस घटना का दोषी पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर को मानते थे। 

 

उधम सिंह का का पहली बार विदेश जाना

 

जलियांवाला बाग हत्याकांड से Sardar Udham Singh इतने ज्यादा आहत हुए थे कि वह दुखी हो कर के देश छोड़कर के अमेरिका चले गए। अमेरिका में हम कुछ वक्त बिताया और वहां से एक पिस्तौल खरीदी।

पिस्तौल खरीदने का सीधा सा मतलब था जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेना। इसके बाद वह भारत में चल रहे बब्बर अकाली मूवमेंट में शामिल होने के लिए वापस भारत आ गए।

 

पहली बार जब जेल गए

 

भारत आने के बाद एक बार उन्हें पिस्तौल के साथ पुलिस ने पकड़ लिया जिसके बाद उन्हें 4 साल की सजा सुनाई गई.।

चार  साल की सजा काटने के बाद जब वापस हो जेल से रिहा हुए तो अपने वह पुश्तैनी गांव सुमान में रहने लगे लेकिन वह पुलिस की नजरों में आ चुके थे।

इस वजह से पुलिस उन्हें हर वक्त परेशान करती रहती थी। पुलिस के द्वारा रोज-रोज परेशान किए जाने की वजह से वह तंग हो गए और अपना पुश्तैनी गांव छोड़कर के अमृतसर में आकर रहने लगे।

यहां पर उन्होंने एक दुकान खोले जिस दुकान का नाम उन्होंने राम मोहम्मद सिंह आजाद रखा इस नाम की सबसे खास बात यह थी कि इसमें हर धर्म का नाम शामिल था।

 

भगत सिंह से थे प्रभावित

 

अब उधम सिंह के अंदर क्रांतिकारी विचार काफी तेजी से आने लगे थे।  वह इन्हीं विचारों के चलते भगत सिंह से खासा प्रभावित थे।

इसी के चलते 1924 में वह सिंह गदर पार्टी में शामिल हो गए। सिंह गदर पार्टी में शामिल होने के बाद वह विदेशियों में रहने वाले भारतीयों को जमा करने के लिए विदेश चले गए।

 उधम सिंह विदेश में 1927 तक रहे। 1927 में भगत सिंह ने उधम सिंह को वापस भारत बुला लिया था। जब उधम सिंह भारत आए तो उनके साथ 25 सहयोगी भी थे।

 इसके साथ-साथ पिस्तौल और गोला-बारूद भी साथ में लाए थे, लेकिन उधम सिंह इन हथियारों को छुपाने में असफल रहे।

इसलिए अवैध हथियार रखने के चलते उन्हें एक बार फिर 5 वर्ष का कारावास हो गया 5 वर्ष की सजा काटने के बाद उधम सिंह 1931 में जेल से रिहा हुए। 

 

जेल से रिहा होने के बाद भी पुलिस उन पर हमेशा नजर बनाकर रखते थे क्योंकि उनके नजर में उधम सिंह एक अपराधी थे, लेकिन उधम सिंह किसी भी तरह से बचते बचाते कश्मीर चले गए और कश्मीर से होकर के फिर वह भारत के बाहर दूसरे देशों में चले गए।

 

इंग्लैंड में लिया बदला

 

1934 में उधम सिंह लंदन पहुंच गए उन्हें जिस व्यक्ति की तलाश थी वह व्यक्ति लंदन में ही रहता था और उसका प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से ही वह लंदन में आए थे।

 

 लंदन में उधम सिंह अपना नाम बदलकर के रहने लगे और घूमने के उद्देश्य से उन्होंने एक कार भी खरीदी। उधम सिंह जनरल डायर के पल-पल की खबर रखने लगे।

 

उन्हें बस एक मौके की तलाश थी जब वह जनरल डायर की हत्या कर सके। लेकिन यह मौका उन्हें 1940 में मिला। 7 साल के इंतजार ने उन्हें इतना माहिर बना दिया था कि वह पुलिस की नजरों से बचते-बचाते जनरल डायर की हत्या करने में कामयाब हो सकते थे। 

 

जनरल डायर की हत्या करने के लिए उन्होंने इंग्लैंड से ही एक पिस्तौल खरीदी थी जिसके लिए उन्होंने 6 गोलियां भी खरीदी थी। 

 

आखिरकार 13 मार्च 1940 को उन्हें वह अवसर मिल गया। रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में एक सभा का आयोजन किया गया था। 

इसमे जनरल डायर भाषण देने वाला था। उधम सिंह भी इस सभा मे पहले ही पहुँच चुके थे। उन्होंने एक किताब को अंदर से एक तरह के काटा था कि उसमें अपनी पिस्तौल छुपा सकें। 

 जब जनरल डायर भाषण देने लगा तो उधम सिंह ने उसकी हत्या कर दी। 

 

उधम सिंह की शहादत – Udham Singh Death

 

उधम सिंह को जनरल डायर की हत्या का दोषी माना गया और फाँसी की सजा सुनाई गई। 31 जुलाई 1940 को को भारत माता के इस वीर सपूत को पेंटनविले जेल में फांसी दी गई। 

 

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