Baba Sohan Singh Bhakna

Sohan Singh Bhakna | बाबा सोहन सिंह भकना का जीवन परिचय

जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, और ब्रिटिश शासन के अंतर्गत देश के लोग चैन की सांस नही ले पा रहे थे, उस वक़्त भी देश मे कई वीर खड़े हुए और ब्रिटिश शासन से मुकाबला किया। इन्ही में से एक Sohan Singh Bhakna है।

 

सोहन सिंह के अंदर भी देश को आजाद कराने की ज्वाला भड़क रही थी और उन्होंने ग़दर आंदोलन पार्टी की स्थापना की और इसके अध्यक्ष बने। लेकिन देश को आजादी दिलाने के राह पर निकले सोहन सिंह को जेल में डाल दिया गया और आजीवन कारावास की सजा सुना दी।

 

आज के इस लेख में हम सोहन सिंह के जीवन के उतार चढ़ाव और संघर्ष के बारे में बात करेंगे और जानेंगे, सोहन सिंह भकना के जीवन की कुछ अहम बातें।

 

Baba Sohan Singh Bhakna Biography

 

सोहन सिंह भकना का जन्म अमृतसर के खुत्र्रा खुर्द गाँव मे हुआ था। इनके पिता किसानी करते थे। इसके माता पिता राम कौर और करम सिंह थे। सोहन सिंह एक  पंजाबी थे इस वजह से इन्हें पंजाबी भाषा सीखने में ज्यादा वक्त नही लगा। इनकी शिक्षा दीक्षा अमृतसर के एक गुरुद्वारे में हुआ था।

सोहन सिंह का पूरा परिवार अमृतसर से 16 किमी दूर भकना गांव में रहता है इसलिए सोहन सिंह के साथ उनके गांव का नाम भी जोड़ दिया जाता है।

बाबा एक शेरगिल परिवार में जन्मे थे। उनकी की शादी 10 वर्ष की आयु में बिशन कौर से हो गई थी जो कि लाहौर के पास के मालिक कुशल सिंह की बेटी थी।

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा 16 वर्ष की उम्र में पूरी कर ली थी, जिसकी शुरुआत उन्होंने 11 वर्ष की उम्र में तब की थी जब उनके गांव में प्राइमरी स्कूल खुला था।

सोहन सिंह की शादी भले ही हो गई थी लेकिन उन्हें पिता बनने का सुख नही मिला पाया कभी भी। सोहन सिंह पंजाबी भाषा के साथ साथ उर्दू और फ़ारसी भाषा के भी अच्छे जानकार थे।

 

Baba Sohan Singh Bhakna की अमेरिका यात्रा

 

Sohan Singh Bhakna  को भारत मे कुछ उतना अच्छा काम नही मिल पा रहा था इसलिए वह काम की तलाश में अमेरिका पहुँच गए। 1907 में जब वो अमेरिका आए तो उन्हें यहां काम मिलने में तो देर नही लगी लेकिन वेतन बहुत कम मिलता था।

 

ऐसा सिर्फ उनके साथ नही बल्कि सभी भारतीयों के साथ होता था। भारतीयों को बाकी लोगों की तुलना में कम वेतन दिए जाने के कारण सोहन सिंह काफी निराश हुए।

 

लेकिन उन्हें यह समझते देर नही लगी यह इसलिए हो रहा है क्योंकि हम गुलाम है, और कम पैसे में भी काम करने को मजबूर हैं।

 

इसके बाद उन्होंने एक अलग दल बनाने की ठान ली और फिर ग़दर आंदोलन पार्टी बनाई। इसके वह अध्यक्ष भी बने।

 

इसके साथ ही लाला हरदयाल ने एक संस्था बनाई जिसका नाम पैसिफ़िक कोस्ट हिन्दी एसोसियेशन था, इस संस्था का अध्यक्ष भी सोहन सिंह भकना को बनाया गया।

 

प्रथम लाहौर षड़यंत्र केस

 

ग़दर आंदोलन पार्टी का मुख्य उद्देश्य था अंग्रेजी शासन को देश से उखाड़ फेंकना। इसके लिए इन्होंने हिंसा का रास्ता चुना। अमेरिका में सेना बनाने के बाद से यह पार्टी काफी ज्यादा काम करने लगी।

 देश से अंग्रेजो को निकाल फेकने के मकसद से इस पार्टी ने जर्मनी में भी अपने संपर्क बना लिए, लेकिन जब अंग्रेजो को इस बात की भनक लगी तो सभी क्रांतिकारियों के ऊपर केस कर दिया और उन्हें लाहौर के जेल में भेज दिया।

 उस वक़्त इस पार्टी में सबसे प्रमुख सोहन सिंह ही थे इस वजह से इनके ऊपर कुछ ज्यादा ही शख्ती दिखाई गई।

Baba Sohan Singh Bhakna के साथ ही बाकी लोगो के ऊपर भी मुकदमा चला और सोहन सिंह को उम्र कैद की सजा सुना दी गई।

 

उम्र कैद की सजा

 

13 अक्टूबर 1914 को उन्हें लुधियाना में पूछताछ के मकसद से लाया गया। यहाँ इनसे पूछताछ हुई जिसके बाद इन्हें मृत्यु दंड की सजा दे दी गई।

 लेकिन आगे चलकर यह स्थिति बदल गई और मृत्यु दंड की सजा को बदलकर आजीवन उम्रकैद की सजा कर दी गई।

 

जेल में बिताया गया जीवन

 

सोहन सिंह गलत देखने वाले व्यक्तियों में से नही थे। इसलिए वह जेल में भी किसी तरह की गलत चीजों को देखकर उसका विरोध करते। उनके विरोध करने का तरीका भूख हड़ताल था।

 

1921 में उन्हें कोयंबटूर के जेल में भेज दिया गया,इसके बाद येरवडा जेल में भेज दिया गया। यहां पर सोहन सिंह ने पहली भूख हड़ताल की। जेल में सिक्खों को उनके धर्म के हिसाब से पकड़ी आदि नही पहनने दी जाती थी।

 

इसी के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल की। इसके बाद उन्हें लाहौर के सेंट्रल जेल में भेज दिया गया। यहाँ पर उन्होंने फिर 1928 में हड़ताल किया।

 

यह हड़ताल इस वजह से था कि जेल में सिक्खों को भी दो गुटों में बांट दिया गया, जिसमे एक थे उच्च वर्ग वाले सिक्ख और दूसरे निम्न वर्ग वाले सिक्ख। यहां उच्च वर्ग वालों को अच्छा खाना दिया जाता था।

 

इसके बाद जब भगत सिंह को फाँसी की सजा सुनाई गई तब भी उन्होंने भूख हड़ताल किया था।

 

जब जेल से रिहा हुए

 

आखिरकार 1930 में उन्हें जेल से रिहा किया गया। जेल से रिहा होने के बाद भी वह देश को आजाद कराने वाले संगठनों के साथ जुड़ गए और साथ मजदूर राजनीति का हिस्सा भी बन गए।

 

धीरे धीरे ये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बहुत नजदीकी हो गए और किसान की सभाओं कर आयोजन का काम करने लगे।

 

हालांकि दूसरे विश्व युद्ध के वक़्त इन्हें दोबारा जेल में भेज दिया, जिसका कारण था कि इन्हें अंग्रेज विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाया गया।

 

लेकिन आजादी के बाद जब देश को पंडित जवाहर लाल नेहरू के रूप में अपना पहला प्रधानमंत्री मिला तो उन्होंने सोहन सिंह को इस परेशानी से दूर किया जिसके बाद वो कभी जेल नही गए।

 

सोहन सिंह की मृत्यु – Sohan Singh Bhakna Death

 

बाबा सोहन सिंह भकना का निधन 20 दिसम्बर 1968

अमृतसर में हुआ था। देश की सेवा में उन्होंने अपने पूरे जीवन को सौप दिया था। ऐसे वीर क्रांतिकारी को देश हमेशा याद रखेगा। 

 

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